गीता मेराचिन्तन अध्याय १७

ॐ श्रीपरमात्मने नमः
                                               
श्रीमद्भगवद्गीता
अथ सप्तदशोऽध्यायः
               संबंध–– शास्त्र प्रमाण कहकर भगवान अपनी वाणी को संभवतः विश्राम देना चाहते थे तथापि भगवान का यह वाक्य कि शास्त्र का त्याग करने वाले का न तो कोई कार्य सिद्ध होता है और न ही सुख मिलता है तो मोक्ष मिलेगा कैसे ? इसलिये शास्त्र प्रमाण के अनुसार ही कार्य करना चाहिए । इस प्रकार सोलहवें अध्याय के अन्त कहे गए भगवान के वाक्यों में एक संदेह हो जाता है कि शास्त्र का ज्ञान सबको तो हो नहीं सकता है अतः उसके अनुसार सभी कर्म कैसे संपादित कर सकते हैं ? किन्तु श्रद्धा तो होती ही है, तो जिनमें शास्त्र प्रतिष्ठित नहीं हैं उनके द्वारा श्रद्धा पूर्वक किये गये कर्मों का फल क्या होगा ? उनकी निष्ठा को आप क्या कहेंगे ?
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ।।१७/१।।
               शब्दार्थ–– अर्जुन बोले–– हे कृष्ण ! जो शास्त्र का त्याग करके श्रद्धापूर्वक पूजन करते हैं उनकी निष्ठा सात्विक अथवा राजस और तामस है ।
              तात्पर्यार्थ–– भगावन ने दो ही संपत्तियां कही हैं सात्विक राजस और तामस । वस्तुतः तीन प्रकार के प्राणी होते देवता, मनुष्य और राक्षस । गुण भी तीन ही होते और गति भी ऊपर नीचे और मध्य होती है । किन्तु भगवान ने मात्र दो विभाग ही किये, पहला जो शास्त्र प्रमाण वाला दैवी जो सत्त्वगुण प्रधान है और दूसरा जो शास्त्र का त्याग करने वाला आसुर राजस और तामस प्रधान । राजस तामस में बहुत अधिक मतभेद नहीं है वे एक दूसरे के पूरक हैं बस रज या तम की प्रधानता से एक अधिक उग्र होता है और दूसरा अवसरवादी । अब इन दो विभागों में भगवान ने शास्त्र का त्याग करने वाले के लिए कहा वर्तते कामकारतः १६/२४ मतलब एक वह जो शास्त्र प्रमाण मानता ही नहीं अनीश्वरवादी अतः वह मनमानी करे तब तो ठीक है लेकिन शास्त्र जानता है और मनमानी करे यह तो बात बड़ी विचित्र होगी । यहां पर शास्त्र त्याग करने वाले ये दोनो एक ही राक्षस कोटि के अन्तर्गत हो गये । अब इन दोनो के बीच में एक कोटि और है कि यजन्ते श्रद्धयान्विताः, भगावन ने कहा था कामकारतः तो अर्जुन कहते हैं ठीक है, लेकिन मनमानी नहीं करता है पूर्वजों से कुलदेवी, कुलदेवता सहित बहुत ऐसे कर्म हैं जिन्हें अपने पूर्वजों को ही प्रमाण मानकर यज्ञ, दान, तप आदि बड़ी श्रद्धा से करते हैं मनमानी बिल्कुल नहीं करते, आपने भी बारंबार जनकादि पूर्वजों को प्रमाण मानकर ही कार्य करने की बात कही है, ये जो तीसरी कोटि के शास्त्र विधि को न जानने वाले हैं– यहाँ ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य का अर्थ शास्त्र की विधि का त्याग करने वाले न होकर शास्त्र विधि को न जानने वाले ऐसा अर्थ है क्योंकि श्रद्धा समन्वित है वह विधि का त्याग कर ही नहीं सकता, यही श्रद्धा का प्रमाण है तथापि श्रद्धापूर्वक वृद्ध प्रमाण से करने वाले की निष्ठा यानी उसकी स्थिति क्या सात्त्विक है ? अथवा राजसी या तामसी है ? यहां अर्जुन सात्विक के बाद अथवा कहते हैं– इसका मतलब अगर सात्त्विक निष्ठा है तब तो ऐसे शास्त्र का त्याग करने वाला भी दैवीसम्पत्ति वाला है इसलिये शास्त्र प्रमाण की कोई आवश्यकता ही नहीं है वृद्ध प्रमाण से काम चल जायेगा अथवा ऐसा न होकर उसे भी शास्त्रविधि की अनुपलब्धता में राजस तामस कहा जायेगा ? इस प्रकार अर्जुन भविष्य में आने वाले समय आज या आने वाले कल के विषय में सात्त्विक श्रद्धा से संपन्न साधकों के समाधान के लिए प्रश्न पूछा । ऐसा इसका भाव है ।।१।।

               संबंध–– मनुष्य में सहज ही तीन प्रकार की श्रद्धा का वर्णन…..
श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु ।।१७/२।।
              शब्दार्थ–– श्रीभगवान बोले–– मनुष्यों की तीन प्रकार की श्रद्धा स्वभाव से ही उत्पन्न होती है, सात्त्विकी और राजसी एवं तामसी भी इस प्रकार से उनको सुनो…..
              तात्पर्यार्थ–– पूर्व अनन्त जन्मों के संस्कार लेकर ही मनुष्य उत्पन्न होता है और उसी पूर्व संस्कार के अनुसार एक जन्म से ही सत्त्वस्थ ब्रह्मवित् के कुल में जन्म लेता है, तो वहीं दूसरी ओर रजोगुण संपन्न देवाराधन यज्ञ, दान आदि में प्रवृत्ति के हेतु ऐसे रजोगुण संपन्न धनाढ्य के घर, तो अन्य जन्म से ही तमोगुण प्रधान बधिक के घर में जन्म लेता है और सभी अपने अपने जन्मना स्वाभाविक कर्मों से बंधे हैं स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा १८/६० ।  अतः वे भले शास्त्र संपन्न न हों लेकिन उनके तीनो प्रकार के लक्षण सुनो….
               टिप्पणी–– स्वाभाविक कर्मों से बंधा होने के कारण इस वर्तमान समय में दिये गये शास्त्र संस्कार पूर्व संस्कार के उदित होने पर दब जाते हैं, अतः यहाँ स्वाभाविक तीनो गुणों से संपन्न के यज्ञ, दान, तप और श्रद्धा जिनक का वर्णन पीछे किया गया है उनका विस्तार यहां किया जा रहा है । ताकि आरुरुक्षु सात्वसम्पन्न होकर अपना कल्याण कर सके या सावधान हो जाये । यह भाव है ।।२।।

             संबंध–– यह मनुष्य श्रद्धामय है और उसी के अनुसार उसकी निष्ठा होती है, इसका कथन….
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धायोऽयं यो पुरुषो यो यच्छ्रद्धा स एव सः ।।१७/३।।
              शब्दार्थ–– स्वभाव के अनुसार सभी प्राणियों की श्रद्धा होती है । यह पुरुष श्रद्धासमन्वित है । जो जिस श्रद्धा वाला होता है वह वैसा ही होता है ।
               तात्पर्यार्थ–– अर्थात जिन पूर्व अनन्त जन्मों के गुण दोषों के आधार पर मनुष्य का जन्म हुआ उन्हीं गुण दोषों के आधार पर उसका अन्तकरण अर्थात भाव होगा, उसी भाव के अनुसार श्रद्धा होती है । इसलिये यह पुरुष श्रद्धा स्वरूप ही है । जैसा भाव अर्थात श्रद्धा होती है मनुष्य उसी निष्ठा वाला होता है अर्थात उसकी वैसी ही स्थिति होती और वही वह कार्य करेगा ।
              सामान्य भाव–– यहाँ वैसी ही स्थिति होती है कहने का अभिप्राय यह है कि वह वैसी ही उपासना और कर्म में लगा जायेगा और वह वैसा ही करेगा इच्छा न होने पर भी कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् १८/६० यही स्थिति होगी । यही भाव यहां है जैसा कि अगले श्लोक में कहते हैं….
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान्भूतगणान्श्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ।।१७/४।।
              शब्दार्थ–– सात्त्विक देवताओं की, राजस यक्ष एवं राक्षसों की, और अन्य तमसी भूत-प्रेत आदि की उपासना करते हैं ।
             तात्पर्यार्थ–– दैवी संपत्ति देवता अर्थात ईश्वर से संबंधित है और सत्त्वगुण गीता में मोक्ष लेने वाला कहा गया है, अतः मोक्ष प्रदान करने वाले अधिकारी देवता, शिव, विष्णु, सूर्य, गणेश और देवी ये पांच देवता कहे गये हैं इनका उपासक सात्त्विक होता । शेष अर्थ स्पष्ट है । इन चिह्नों से व्यक्ति की स्थिति समझ लेना चाहिए ।।५।।

              संबंध–– अब राजसी और तामसी का दो श्लोकों से लक्षण बता रहे हैं….
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ।।१७/५।।
              शब्दार्थ–– जो लोग शास्त्र विहित नहीं है ऐसा कठोर तप काम राग एवं बल के मद में अहंकारपूर्ण तप करते हैं । 
              तात्पर्यार्थ–– अहंकार आदि की व्याख्याएं पहले की जा चुकी हैं । शेष अर्थ स्पष्ट है ।।६।

कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ।।१७/६।।
             शब्दार्थ–– तथा जो शरीर के रूप में स्थित पंचमहाभूतों को मूढ उपरोक्त अशास्त्रीय तप द्वारा कृश अर्थात सुखा देते हैं शरीर के अन्दर स्थित मुझको ही सुखा देते हैं, अतः तुम उन्हें असुर जानो ।
            तात्पर्यार्थ–– शास्त्र विधि से रहित तप निषेध किये गये हैं, इसका अर्थ यह हुआ कि शास्त्र यदि कहता है कि तप करो और शरीर को सुख या नष्ट कर डालो तो उस विधि को ठीक से समझकर वैसा कर ही डालना चाहिए । शास्त्र की बात में निश्चय होता है विकल्प नहीं ।यह भाव है ।।६।।

                संबंध–– श्लोक दो में सत्त्वादि गुणों को जन्मज बताया किन्तु हमारे गुणों की वृद्घि और क्षय में आहार प्रधान कारण है । सत्त्व का संरक्षण बिना आहार शुद्धि के नहीं हो सकता आहार शुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः । स्मृतिर्लाभे सर्वग्रन्थीनां विप्र मोक्षः ।। आहार की शुद्धि से मुमुक्षु संपूर्ण ग्रंथियों से मुक्त हो जाता है जिसके कारण ही यज्ञ, दान, तप में उसकी उसी के अनुसार प्रवृत्ति बनती है इस कारण से पहले त्रिविध आहार आदि का उपक्रम करते हैं….
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु ।।१७/७।।
            शब्दार्थ–– सभी प्राणियों का आहार यानी भोजन तीन प्रकार का प्रिय होता है । यज्ञ, तप तथा दान भी तीन प्रकार के होते हैं । उनके इन भेदों को सुनो ।।७।
           तात्पर्यार्थ–– अर्थ स्पष्ट है ।

             संबंध–– यहाँ से आहार, यज्ञ, दान और तप का वर्णन बाइसवें श्लोक तक १५श्लोकों में….
आयुःसत्त्वबलारोग्य सुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ।।१७/८।।
           शब्दार्थ–– आयु, सत्त्व, बल, आरोग्य, सुख, प्रीति को बढाने वाला रसयुक्त, चिकना, हृदय को पुष्ट करने वाला आहार सात्त्विक को प्रिय है
          तात्पर्यार्थ–– आयु को बढ़ाने वाला अर्थात श्वास संयमित रखने वाला, क्योंकि श्वास नियंत्रित होगी तभी आयु बढ़ेगी, सत्त्वगुण को बढाने वाला, क्योंकि सत्त्वगुण बढ़ेगा तभी सूक्ष्म विचार होग और तभी ज्ञान की उत्पत्ति होगी सत्वात्सञ्जायते ज्ञानं १४/१७ । बल यानी शरीर एवं इन्द्रियों का बलवान होना तभी शरीर से अधिक देर निदिध्यासन या ध्यान के लिए बैठ सकेंगें और इन्द्रियों में चञ्चलता न होने से एकाग्रता होगी । आरोग्य अर्थात निरोग प्रदान करने वाली । सुख अर्थात खाने से मन प्रसन्न हो जाये । प्रीति अर्थात भोजन देखने मात्र से खाने में रुचि बढ़ जाये 
                भोजन सरस हो, स्निग्ध अर्थात चिकना हो । चिकने का मतलब रिफाइंड तेल अधिक भोजन में नहीं भरना बल्कि घी, मक्खन जैसे चिकने  पदार्थ होना चाहिए । खाने में तो सुपाच्य हों लेकिन जिनका सत्व अर्थात सार भाग अधिक समय तक शरीर में प्रभावकारी हो एवं हृदय को पुष्ट करने वाला हो अर्थात फेफड़े आदि स्वस्थ रह सकें । इस प्रकार का आहार यानी भोजन सात्विक स्वभाव वाले को प्रिय होता है ।
                जैसे सिद्ध के लक्षण साधक के लिए साधन हैं वैसे ही स्वभाव से जिनका सात्विक भोजन है वह साधक को प्रयत्न पूर्वक लेना चाहिए इसी को युक्त आहार कहा गया है युक्ताहारविहारस्य ६/१७ ।।८।।

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ।।१७/९।।
              शब्दार्थ–– कटु, खट्टा, नमकीन, अत्यन्त गरम, तीखा, रूखा, जलन पैदा करने वाला दुःख, शोक और रोग देने वाला भोजन राजसी को प्रिय होता है ।
             तात्पर्यार्थ–– अति कुड़ुवा, अति खट्टा आदि अति लगाकर सबके साथ समझ लेना चाहिए ।।९।।

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ।।१७/१०।।
             शब्दार्थ–– एक प्रहर व्यतीत हो गया हो, रस बदल गया हो, और जो बासी हो, जूठा और अमेध्य भोजन तामसी को प्रिय होता है ।
            तात्पर्यार्थ–– प्रहर बीतना मतलब अधिक ठंडा या सूख जाना, अधिक देर होने से रोटी आदि कई पदार्थ सूख जाते हैं । गत रस का मतलब जिसका स्वाद बदल गया हो, रस बेरस हो गया हो । अमेध्य का मतलब जो बुद्धि को बिगाड़ने वाले मांस, मछली, अंडे आदि । शेष अर्थ स्पष्ट है ।
             भावार्थ–– इस प्रकार लक्षणों को समझ कर मुमुक्षु सात्विक भोजन करे यही इसका भाव है ।।१०।।

             संबंध–– त्रिगुणात्मक आहार विवेचन के बाद त्रिगुणात्मक यज्ञ का तीन श्लोको में विवेचन...
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ।।१७/११।।
              शब्दार्थ–– जो फल की इच्छा न रखकर कर्तव्य पालन के लिए ही विधिपूर्वक यज्ञ का यजन करता है जिससे मन का समाधान हो वह सात्विक है ।
              तात्पर्यार्थ–– निष्काम भाव से यज्ञादि सभी प्रकार से कर्तव्य परायणता । एवं शास्त्रीय निर्देश पूर्वक किये गये कर्म से मन का समाधान यानी मन को शान्ति देने वाले यज्ञ सात्विक हैं ।।११।।

अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसं ।।१७/१२।।
               शब्दार्थ–– किन्तु जो फल प्राप्ति के लिए और दिखावे के लिए भी यज्ञ करते हैं हे भरतश्रेष्ठ ! उसको राजसी जानो ।
               तात्पर्यार्थ–– इस लोक में धन संपत्ति पुत्रादि के लिए एवं स्वर्गादि परलोक की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला जो भी कर्म है एवं दिखावे और प्रतिष्ठा पाने के लिए दंभपूर्ण यज्ञादि कर्म राजस हैं । तु शब्द सात्त्विक यज्ञ से राजस तामस यज्ञ की विलक्षणता दिखाने के लिए है ।।१२।।

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ।।१७/१३।।
               शब्दार्थ–– शास्त्रविधि से रहित, अन्नदान से रहित, बिना वैदिक मंत्र एवं बिना दक्षिणा के श्रद्धा से रहित यज्ञ तामस समझना चाहिए ।
               तात्पर्यार्थ–– जिसमें श्रद्धा न होगी तो दक्षिणा देना, अन्नदान आदि यज्ञाङ्ग कार्य करेगा ही नहीं और इसके बिना सकाम निष्काम कोई कर्म पूरा होता नहीं । मंत्र भी कोई नहीं और हैं तो आधे से अधिक गलत पढ़ना । ये सब तामस यज्ञ समझना चाहिए ।
            भावार्थ–– इस प्रकार लक्षण समझकर अन्नदान और दक्षिणा में कंजूसी न करता हुआ विधिपूर्वक ही शुभकर्म करे चाहे सकाम हो या निष्काम ।।१३।।

                संबंध–– अब तीन प्रकार के तप का वर्णन….
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ।।१७/१४।।
              शब्दार्थ–– देवता, श्रोत्रिय यानी वेद का ज्ञाता, गुरु, ब्रह्मनिष्ठ का पूजन एवं बाहर की पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य का पालन, और अहिंसा ये शारीरिक तप कहे गए हैं ।
               तात्पर्यार्थ–– देवता कुल पूज्य देव, या गुरु प्रदत्त मन्त्र का देवता, ब्राह्मण यानी श्रोत्रिय, गुरु परमार्थ पथ प्रदर्शन करने वाले सद्गुरु, अधिक विस्तार अध्याय ४ के श्लोक ३४ की व्याख्या देखना चाहिए । प्राज्ञ यानी आत्मतत्त्व में स्थित ब्रह्मवेत्ता । ब्रहमचर्य से इन्द्रिय दमन, और अहिंसा किसी के साथ मारपीट न करना, हत्या न करना । ये शारिरिक तप हैं । यहां सभी लक्षण स्थूल शरीर से संबद्ध हैं अतः इन को बाहरी लक्षण समझना चाहिए ।।१४।।

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ।।१७/१५।।
             शब्दार्थ–– वाणी से किसी को उद्वेग या विक्षेप न हो ऐसी विनम्रता, सत्य, प्रिय एवं हितकर भी हों, और स्वाध्याय में अभ्यास के लिए जो शब्द होते हैं वह वाणी का तप है ।
              तात्पर्यार्थ–– सत्य तो हो लेकिन मन को ठेस पहुचाने वाले वाक्य न बोलना, और ऐसे वाक्य बोलना कि जिसमें किसी का हित हो बाकी मौन, प्रारंभिक शिक्षाकाल में कण्ठस्थ यानी याद करना पड़ता है उसमें उच्चारण पूर्वक याद करने में अधिक सुविधा होती है अतः ऐसा उच्चारण तप है ।
              भावार्थ–– अनर्गल प्रलाप से बचना वाणी का तप है यही इसका भाव है ।।१५।।

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ।।१७/१६।।
               शब्दार्थ–– मन का प्रसन्न रहना अर्थात निर्विकार, सौम्य अर्थात अन्दर से बिल्कुल शान्त यानी हलचल रहित, मौन, मन का निग्रह । भाव में शुद्धता अर्थात निश्छलता, ये मानसिक तप कहे गये हैं । 
              तात्पर्यार्थ–– प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये अर्थात मन प्रसन्न होने पर सभी विघ्न शान्त हो जाते हैं, प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते २/६५ अर्थात मन के प्रसन्न होने से सभी विघ्न नष्ट होते हैं एवं बुद्धि शीघ्र समाहित हो जाती है । हलचल रहित शान्त, मौन का अर्थ अध्याय १४ के पहले श्लोक में मुनि की व्याख्या देखना चाहिए और आत्मनिग्रह का मतलब सूक्ष्म इन्द्रियों सहित मन का उनके विषयों से नियंत्रण । ये मानसिक तप कहे गये हैं ।
         भावार्थ–– साधक में ये तीनो तप आवश्यक हैं ऐसा इसका भाव है ।।१६।।

              संबंध–– त्रिविध तप के बाद त्रिविध श्रद्धा का वर्णन….
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्विकं परिचक्षते ।।१७/१७।।
              शब्दार्थ–– परम श्रद्धा से युक्त पुरुष फल की इच्छा न रखते हुए उपरोक्त तीनो तप करता है उसे सात्विक कहा जाता है ।
              तात्पर्यार्थ–– परम श्रद्धा वही होती है जो एक मात्र परमेश्वर से भिन्न कुछ नहीं चाहता है । ऐसा तप सात्विक कहा गया है । अर्थात इस प्रकार की श्रद्धा भी सात्विक कही गई है ऐसा अध्याहार कर लेना चाहिए क्योंकि जैसी श्रद्धा होगी वैसा ही कर्म और स्थिति होगी यह इसी अध्याय के तीसरे श्लोक में कह चुके हैं ।।१७।।

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ।।१७/१८।।
              शब्दार्थ–– सत्कार पाने के लिए, सम्मान पाने के लिए जो दंभपूर्वक तप किया जाता है वह वह स्थिर न रहने वाला अल्पकालिक राजस तप है इस-प्रकार कहा गया है । 
           तात्पर्यार्थ–– यहाँ  चलम् शब्द से तुरन्त फल और अध्रुव का मतलब क्षणिक फल समझना चाहिए । बाकी सब स्पष्ट है ।।१९।।

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ।।१७/१९।।
             शब्दार्थ–– मूढ पुरुषों द्वारा केवल आत्मा को पीड़ा देने के लिए तप किया जाता है अथवा दूसरो का नाश करने के लिए करता है, वह तप तामस कहा गया है ।
             तात्पर्यार्थ–– आत्मा यानी शरीर को कष्ट देना अथवा दूसरों के नाश के लिए भूत प्रेत, आदि की उपासना करके दूसरों के नाश के लिए । शेष अर्थ स्पष्ट है ।
            भावार्थ–– इन तीनों श्लोकों का भाव क्रमशः चौथे, पांचवें एवं छठे श्लोक से सम्बद्ध करके समझ लेना चाहिए ।।१९।।

               संबंध–– तीन प्रकार के दान कहते हैं….
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ।।१७/२०।।
              शब्दार्थ–– मात्र देना चाहिए इस प्रकार जो दान बदले में अपने प्रति उपकार न चाहते हुए देता है,  देश, काल और पात्र का विचार करके देता है वह सात्त्विक दान है ऐसा समझना चाहिए ।
              तात्पर्यार्थ–– शास्त्र की आज्ञा है कि देना चाहिए इसलिये देना, बाकी और कोई कामना नहीं रखना, ऐसा दान देश या समाज पर संकटकाल अथवा पवित्र देश काशी ऋषीकेश आदि क्षेत्र भी । वर्तमान काल की परिस्थिति क्या है ऐसा विचार कर देना, जैसे कोई यज्ञ, कथा भागवत आदि शुभकार्य के समय अथवा धन की कमी से किसी के प्राणों पर संकट आने पर जो दिया जाये यह काल यानी समय की व्यवस्था या मांग है ऐसे अवसर पर देना । पात्र का मतलब जिसे वास्तव में जो आवश्यक है उस शुद्ध अधिकारी पात्र को ही देना ये सात्त्विक दान समझना चाहिए ।
              भावार्थ–– सामर्थ्यवान को निरपेक्ष दान देना ही चाहिए । यही भाव है ।।२०।।
           
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ।।१७/२१।।
               शब्दार्थ–– किन्तु जो बदले में सहयोग की अपेक्षा रखकर देता है अथवा किसी विशेष फल के उद्देश्य से पुनः पुनः देता और देने में अधिक कष्ट भी मन में होता है उस दान को राजस समझना चाहिए ।
              तात्पर्यार्थ–– देना नहीं चाहता है चंदा आदि पर समाज में प्रतिष्ठा का मामला होने से कष्टपूर्वक देना, मन में किसी देवता आदि के लिए अथवा किसी तांत्रिक आदि से किसी फलेच्छा से न चाहकर भी कष्टपूर्वक देना या हम नहीं देंगे तो हमें कौन देगा या आज हम इसका सहयोग करेंगे तो कल हमारा भी सहयोग करेगा, इस भाव से दिया गया दान राजस है । दान भी करे बाद में पछताये भी उसे दत्तानुतापी कहते हैं ।।२१।।

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ।।१७/२२।।
                शब्दार्थ–– बिना देश काल पात्र का विचार किये तथा जो बिना सत्कार के एवं अवज्ञा यानी अपमान पूर्वक दिया जाता है वह दान तामस कहा गया है ।
                तात्पर्यार्थ–– बिना अर्घ्य, पाद्य के बिना सम्मान एवं अवज्ञा यानी अवहेलना या अपमान करके दिया जाने वाला दान तामस समझना ।
            टिप्पणी–– यहां उपरोक्त में यज्ञादि शब्दों की व्याख्या न करने का कारण यह है कि पूर्व में ये सभी व्याख्याएं हो चुकी हैं । मात्र सात्त्विक, राजस और तामस कर्मों का परिचय कराया गया है ।।२२।।

               संबंध–– किये गये यज्ञ दानादि सात्त्विक कर्मों में प्रायश्चित का विधान….
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुराः  ।।१७/२३।।
              शब्दार्थ–– ॐ तत् सत् इस प्रकार ब्रह्म के तीन नाम कहे गये हैं । उससे ब्राह्मण, वेद और यज्ञ सृष्टि के आदि में उत्पन्न हुए ।
              तात्पर्यार्थ–– यहां विषय श्रद्धा का चल रहा है । गल्तियां तो स्वाभाविक होती हैं मंत्र शुद्ध होने पर भी मंत्र बोलने का तरीका यजुर्वेदीय है और बोल दिया ऋग्वेदीय प्रकार से तो दोष आ जायेगा । लेकिन श्रद्धा से कर रहा है किसी कामना के उद्देश्य से नहीं । इसलिये उसके दोष पूर्ति के लिए प्रायश्चित विधि बताया जा रहा है ताकि कर्म सर्वांगीण पूर्ण हो सके । 
              कुछ लोग ब्रह्म का अर्थ वेद और वेद का अर्थ वैदिक कर्म और वैदिक कर्म से यज्ञ ऐसा अर्थ करते हैं और सही भी होगा तथापि यज्ञ स्वयं ही वैदिक कर्म है अतः वेद का अर्थ वैदिक कर्म अलग से युक्तिसंगत नहीं लगता । अतः ब्रह्म का अर्थ ब्राह्मण ही ठीक होगा क्योंकि ब्राह्मण ही यज्ञ का अनुष्ठान करेगा, विधि का विधान वेद करेगा और क्रिया यज्ञ होगी । यही इन तीनों का भाव है ।।२३।।

             संबंध–– अब तीनो मंत्रों का माहात्म्य बताते हैं….
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ।।१८/२४।।
              शब्दार्थ–– इसलिये यज्ञ, दान, तप रूप क्रियाओं में ॐ इस प्रकार बोलकर ब्रह्मवादी निरंतर कहे गये विधान के अनुसार आरंभ करते हैं ।
              तात्पर्यार्थ–– चूंंकि उपरोक्त तीनो नाम प्रायश्चित रूप में कर्म की त्रुटि पूर्ण करके निर्दोष करते हैं इसलिये जो वैदिक कर्म के ज्ञाता हैं वे ॐ बोलकर कर्म का आरंभ करते हैं । 
               यहाँ पर कुछ विद्वान उपरोक्त ब्राह्मण का अर्थ ब्राह्मणादि तीन वर्ण करते हैं । वह युक्ति संगत नहीं लगता है क्योंकि आपने पहले ब्राह्मण का अर्थ वेद किया है, अतः आपमें ही विरोधाभास है तो हम क्यों स्वीकार करें ? दूसरी बात यहाँ पर यज्ञ दान तप एवं क्रिया ये चार शब्द कहे गए हैं, उनमें यज्ञ तो ब्राह्मण ही करायेगा अतः यहां तीन वर्ण का प्रश्न ही नहीं है । दान और तप अपने अधिकारानुसार कोई भी कर सकता है । यहाँ हठधर्मिता से तीन वर्ण भी ले सकते हैं । यद्यपि आज के समय में यह परिहास मात्र है, किन्तु बहुवचन में क्रियाः प्रयुक्त हुआ है । अतः यज्ञ दान और तप के अतिरिक्त हमारे जीवन में खाने पीने से लेकर बहुत सारी क्रियाएं होती हैं । उनको भी गीता यज्ञ ही कहती है । उन सभी स्थितियों में वासुदेवः सर्वम् सूत्र कैसे लागे होगा ? अतः ॐ सार्वभौम अर्थ में होगा यह सिद्ध हुआ ।
               प्रसंगानुसार बात चल रही है श्रद्धापूर्वक किये गये यज्ञादि कर्म की, तो शास्त्र का ज्ञान न होने से बहुत सारी विडंबनाएं आज के युग में उपस्थित हो चुकी हैं । जैसे आज भी जनसामान्य में किसी अतिथि के आने पर उसे न अर्घ्य दिया जाता है और न ही पाद्य अर्थात किसी संत या ब्राह्मण आदि पूज्य या अतिथि देवता के आने पर उनको अर्घ्यादि न देकर सीधे गृह प्रवेश या बाहर ही भिक्षादि से संतुष्ट करके वापस कर देते हैं । इसका अर्थ यह हुआ कि वह कर्म तामसी हो गया ? कदापि नहीं, क्योंकि यही तो अर्जुन जानना चाहता है कि आखिर जो शास्त्र ज्ञान नहीं रखते हैं किन्तु श्रद्धा बहुत है तो उनकी निष्ठा का क्या होगा तेषां निष्ठा तु का कृष्ण ? क्या उनकी निष्ठा, उनका कर्म व्यर्थ हो गया ? इसी बात को लेकर भगवान कहते हैं कि नहीं, उनकी निष्ठा व्यर्थ बिल्कुल नहीं हो सकती है क्योंकि जो वैदिक कर्म के प्रकांड विद्वान हैं उनसे भी गलती होती है । जैसे कहीं तो स्वर निम्न होना चाहिए तो उच्च हो गया और जहाँ उच्च होना चाहिए वहां निम्न हो गया अवथा प्लुत हो गया यह मंत्र दोष, फिर वस्तु दोष, इत्यादि दोष पर दोष हैं । अब देखो जब वेदाध्ययन करते हैं तब हरिः ॐ बोलते हैं किन्तु ऐसा वेद में कहाँ लिखा है कि हरिः ॐ बोलकर वेद मंत्र पढो ? लेकिन परंपरागत है अतः वह निर्दोष है क्योंकि निष्ठा और श्रद्धा से किया जा रहा है । अतः जब सर्वत्र दोष होने पर भी उनके कर्म की पूर्ति हो जाती है तो जिसे शास्त्र का ज्ञान तो नहीं है किन्तु समर्पण भाव है परम श्रद्धा है तो उसका कार्य सात्विक है और उस कार्य का प्रारंभ ॐ यानी परंपरा से प्राप्त अपने आराध्य के मंत्र से करे ।
             यहां शंका हो सकती है कि ॐ का ही उच्चारण क्यों ? अन्य मंत्र क्यों नहीं ?  इसका उत्तर यह है कि कुछ मंत्र ऐसे होते हैं जो केवल विश्व का ही वर्णन करते हैं, कुछ विराट का और कुछ परमतत्त्व परमेश्वर का किन्तु कुछ ऐसे मंत्र होते हैं जो सभी का एक साथ वर्णन करते हैं, जैसे गीता में जीव विश्व हो गया जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ७/५ । वासुदेवः सर्वम् विराट हो गया और पुरुषोत्तम परमतत्त्व हो गया । किन्तु येन सर्वमिदं ततम् से जीव २/१७, विराट ८/२२, एवं परमतत्त्व १८/४६ हो गया । इसी प्रकार ॐ सभी का सूत्र है सूत्रे मणिगणा इव ७/७। सूत्रात्मक होने से ही ॐ वह स्वयं में सर्वांग है इसलिये कर्मों को बलवान और सर्वांगीण एवं परिपूर्ण करने के लिए ॐ का उच्चारण किया जाता है । यह तात्पर्य है ।।२४।।

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ।।१७/२५।।
              शब्दार्थ–– मोक्ष की इच्छा रखने वाले यज्ञ दान तप आदि नाना प्रकार के भोजन, शयन आदि सहित कर्म करते हैं उनमें एक किसी प्रकार की फलाकांक्षा रखकर नहीं करते बल्कि सब तत् अर्थात उस ब्रह्म के उद्देश्य से निष्काम भाव से करते हैं ।
             तात्पर्यार्थ–– मत्कर्मकृन्मत्परमो ११/५५ की ही यहां व्याख्या समझना चाहिए कि संसार की कोई वस्तु न हमारी है न हम संसार के हैं ये सब वस्तुएं और मैं सब भगवान के ही हैं, सब भगवान ही हैं । इस प्रकार एक मात्र स्व-स्वरूप परमसत्ता में प्रतिष्ठित होना ही जिनका परम उद्देश्य है ऐसे मोक्षकामी सभी लौकिक कर्म भी परमेश्वर के लिए ही करते हैं । तत्त्वमसि में जो तत् पदार्थ के रूप में कहा गया है वही यहां समझना चाहिए कि वही परमसत्ता मेरे और संसार सहित सभी रूपों में विद्यमान है और हमारा प्रत्येक कर्म हमारा नहीं अपितु उनकी अनादि और अभिन्न शक्ति माया का है और मैं उनसे अभिन्न परमसत्ता मात्र हूँ । यही तत् भाव का तात्पर्य है ।
              यहाँ हम फिर कहेंगे कि बारंबार मोक्ष के प्रसंग में तीनो वर्णों को खींचकर लाना और उनका ही मोक्ष में अधिकार बताना यह पूर्णतः शास्त्र निशिद्ध और एक अपने ही धर्म को नाश करने की साजिश है । पहली बात आपने अखंड सत्ता को मात्र अपना नया संप्रदाय चलाने के लिए मात्र जीव और ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन करने वाली श्रुतियों को क्षतविक्षत करके खंडित कर दिया और दूसरी तरफ बारंबार यहाँ पर कोई प्रसंग न होने पर भी त्रैवर्णिक मात्र की बात कर रहे हैं । तो त्रैवर्णिक से आपने क्या समझा क्या गीता के अध्याय १८ में कहे गये चातुर्वर्णिक लक्षणों पर ध्यान दिया ? उन लक्षणों वाला उन उन वर्णों का होगा या नहीं ? अगर उन लक्षणों वाला ही उन वर्णों का होगा तो समाज में भेद पैदा करने वाले जन्मज कुकर्मों में लिप्त त्रैवर्णिक बात किस आधार पर कर रहे हैं ? दूसरी बात येऽपि स्युः पापयोनयः ९/३२ में भी स्वयं श्रीकृष्ण ने मोक्ष का अधिकार मानव मात्र को दिया है है इस आधार पर भी आपकी हठधर्मिता ही सिद्ध होती है और यही समाज के विघटन का मूल कारण रहा है जिसके कारण हम आर्य वर्ग पतित होते गये और आज पूरे विश्व में फैले हुए सनातन साम्राज्य का नाश हो गया और म्लेच्छों का संपूर्ण विश्व में आधिपत्य हो गया । क्या उनमें मोक्ष नहीं है ? क्या उनमें कोई योगी नहीं होते ? अरब देश के संत मंसूर मियां को फांसी मात्र अनलहक के उद्घोष के लिए दी गई थी । अनलहक यानी अहं ब्रह्मास्मि । इनको क्या कहेंगे ? आप अहं ब्रह्मास्मि ही तो नहीं कहने देंगे क्योंकि यह वेद मंत्र है लेकिन अनलहक कहने से तो नहीं रोक सकते ? केवल भाषा और शब्द बदल देने मात्र से तो परमसत्य तो नहीं बदल जाता ? आकाश को Sky और पानी को Water कह देने मात्र से शब्द का लक्ष्यार्थ तो नहीं बदल गया ? यह मत भूलो कि परमात्मा एक भ्रम है और उसकी प्राप्ति या मोक्ष भी भ्रम ही है । आत्मा से भिन्न न कोई परमात्मा है, न कोई मोक्ष है और न ही प्राप्तव्य है । 
              हम आज हिन्दू भले बन गए हैं, क्यों बन गये हैं हम नहीं जानते ? क्या परिस्थियां रही होंगी हम नहीं जानते, लेकिन इतना हम अवश्य जानते हैं कि कोई भी हिन्दू शब्द की कैसी भी व्याख्या कर ले लेकिन जो भी वेद प्रमाण मानते हैं वे सभी जानते हैं कि हम हिन्दू नहीं हैं, हम आर्य हैं आर्य । तथापि समाज में अपनी प्रतिष्ठा पाने के लिए समाज का विभाजन इन्हीं लोकाकांक्षी तथाकथित धर्माचार्यों ने ही किया है जिसका भयंकर रूप आज दिख रहा है और अति भयंकर आने वाला है । हमने एक बार कुछ बैठे हुये दंडी स्वामियों से पूछा कि आप जब ब्राह्मणेतर को संन्यास नहीं दे सकते हैं तो शिष्य क्यों बनाते हो ? तो उत्तर मिला कि किसने कहा हम शिष्य बनाते हैं ? हम मात्र शिष्य के नाम से लोगों को भ्रमित करते हैं क्योंकि ऐसा नहीं करेंगे तो हमारा सामान कौन ढोयेगा ? ब्राह्मण बालक तो ढोयेगा नहीं क्योंकि वह स्वयं दूसरे से ढोवाता है । यह है आज का विकृत समाज का रूप ।
              यहाँ पर यदि ब्राह्मण शब्द भी रख दिया जाता तो सभी अर्थ अपना अपना कर लेते । एक जाति या वर्ण से ब्राह्मण समझ लेता और दूसरे ब्रह्म को जानने की इच्छा वाला । अतः यहाँ ॐ तत् सत्य शब्द सार्वभौमिक है । इसमें किसी प्रकार त्रैवर्णिक बाध्यता नहीं है । ऐसा समझना चाहिए ।।२५।।               

सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ।।१७/२६।।
              शब्दार्थ–– सद् भाव और साधु भाव में सत् इस प्रकार प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ ! कर्मों को प्रशस्त करने के लिए सत् शब्द का उपयोग किया जाता है ।
             तात्पर्यार्थ–– सद्भाव यानी जो सामने तो दिख नहीं रहा है लेकिन वस्तु है जैसे देवदत्त का पुत्र है मतलब कहीं खेल रहा होगा किन्तु है यह सत्ता का सूचक है । इसी प्रकार सदेव सोम्यं इदमग्रं आसीत् अर्थात हे सोम्य ! वह परमेश्वर इस सृष्टि से पहले था । ये सत्ता वाचक परमेश्वर का नाम है । अमानित्वादि का पालन करने वाले को भी साधु कहते हैं । यहां साधु शब्द से केवल सांप्रदायिक साधु नहीं समझना है, जो भी अमानित्वादि का पालन करे वही साधु है । सत् शब्द कर्मों को प्रशस्त यानी निर्दोष करने के लिए भी किया जाता है । यह भाव है ।।२६।।

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ।।१७/२७।।
            शब्दार्थ–– तथा यज्ञ दान और तप में जो स्थित है वह सत् है इस प्रकार कहते हैं और उससे संबंधित कर्म भी सत् इस प्रकार जानना चाहिए ।
            तात्पर्यार्थ––यहाँ सात्त्विक यज्ञ दान जिन्हें कहा गया है वे सभी सत् इस नाम से कहे गये हैं । एवं तदर्थ का अर्थ है उस ब्रह्म या मोक्ष के लिए इन तीनो से विलक्षण कार्य जैसे हल जोतना, खेत बोना, वर्णानुसार अपने कर्तव्य कर्म में प्रवृत्त होना, खाना पीना इत्यादि मोक्ष के निमित्त किये जाने वाले सभी कर्म भी सत् इस नाम से जाने जाते हैं ऐसा समझना चाहिए ।।२७।।

               संबंध–– अब अभी तक श्रद्धा की बात हुई और अब अश्रद्धा का फल बताते हैं….
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ।।१७/२८।।
               शब्दार्थ–– अश्रद्धा से किया गया होम, दिया गया दान, मात्र शरीर को तपाया गया तप, एवं अन्य किये गये जो भी कर्म वे असत् इस प्रकार कहे गए हैं उनका फल न मरने के बाद होता है और न जीते जी इस लोक में ।
                 तात्पर्यार्थ–– अर्थ तो स्पष्ट ही है । भाव यह है कि अर्जुन ने शास्त्र की जानकारी न रखने वाले श्रद्धापूर्ण कर्मों की स्थिति के बारे में पूछा था उसका पूरा सार इतना है कि वैदिक विधि का ज्ञान तो होना ही चाहिये लेकिन श्रद्धा सर्वत्र प्रधान है और श्रद्धापूर्वक किया गया निष्काम कर्म ही फलीभूत होता है और वह इस लोक में यश आदि सुख देता है और मरने पर परम गति प्राप्त होती है । यही इस अध्याय का अन्तिम सारांश है ।।२८।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्यायः ।


हरिः ॐ तत्सत् !                                       हरिः ॐ तत्सत् !!   हरिः ॐ तत्सत् !!!  
                                                       🌹श्रीकृष्णार्पणमस्तु🌹     



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